प्रेम

 मैं जब किसीपर प्रेम करता हूं अथवा किसी की सेवा करता हूं तो निरपेक्ष और शुध्द भाव से करता हूं , जो प्रेम ईश्वर के ह्रदय तक पहुंचता है !


विनोदकुमार महाजन

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