कालाय तस्मै नम:
*आत्मा मरे हुए लोग ?* ✍️ २८४६ *_विनोदकुमार महाजन_* 🩷🩷🩷🩷 जहाँ आत्मा होती है ? वहाॅं आत्मतत्त्व भी होता है... जागृत आत्मतत्त्व जिसे चेतना , संवेदना भी कहते है ! मगर ? हमारे समाज में सचमुच में ? क्या आत्मीयता समाप्त होती जा रही है ? या फिर समाप्त हो गई है ? क्यों ? क्योंकी... इस भयंकर भागदौड के जीवन में और संघर्षमय जीवन शैली में ? हर एक व्यक्ती अपने अस्तित्व के लिये दिनरात लड रहा है , झगड रहा है ! और इसी भागदौड में शायद खुद को भी भूल रहा है ? भूल गया है ? खुद के अंदर के आत्मा को भी भूल गया है... तो ? आत्मतत्त्व कैसे जीवीत रहेगा ! हर एक व्यक्ती हरदिन दौड रहा है , भाग रहा है ! पैसों के लिये ? या फिर पैसों से मिलने वाले सभी भौतिक सुखों के लिये ? खुद के भागदौड में हर एक व्यक्ती इतना व्यस्त है की , दूसरों के अस्तित्व के बारे में , दूसरों के सुखों के बारे में ? सोचने के लिये ? उसके पास समय ही कहाॅं है ? समय नहीं है शायद ? रास्ते पर कोई एक्सिडेंट से तडप तडप कर मर रहा है ? तो भी ? उसे देखने के लिये अथवा अस्पताल पहुंचाने के लिये किसीके पास समय ही नहीं है ? अथवा समय भी है...