कूंवा ही सूख गया

 *कूंवा ही सूख गया...?*

✍️ २८६७


 *विनोदकुमार महाजन* 


👆👆👆👆


 *शायद...* 

यह एक काल्पनिक बोधकथा भी हो सकती है...अथवा ?

हकीकत भी ??


एक छोटासा गांव था !

हराभरा , संपन्न , खुशहाल !

हरी भरी खेती , हरे भरे प्रसन्न मन, पाणी से भरी हुई नदीयां , कूंवे...

सबकुछ आबादी आबाद था !


सब धन से भी अमीर थे और ? सब के सब ?

मन के भी अमीर थे !


ना जातीवाद था , ना जातीभेद भी था !

ईश्वर के सब एक ही संतांन बडा खुशहाल जीवन जी रहे थे !


हर एक के अंदर ईश्वर का ही वास होता है , ऐसा समझकर , एक दूसरे का बडे आनंद से संन्मान करनेवाले लोग थे वहां ! हर एक अंदर ममत्व था , प्रेम था , स्नेह था !

आपसी लगाव और तालमेल था !


सभी लोग एक दूसरे को बडे ही आनंद से और प्रेम से...

 *रामराम* बोलते थे एक दूसरे को !


मैं भी राम 

तू भी राम...

यह भाव मन में रखकर 

रामराम बोलते थे !


दूसरों का दुखदर्द , पीडा खुद का समझ कर , दूसरों को आधार देनेवाले लोग थे...तकरीबन नब्बे प्रतिशत से भी जादा ऐसे लोग होंगे उस गांव में !


सिधेसादे , भोलेबाले , सभी पर सच्चा प्रेम करनेवाले !


धीरे धीरे समय बदलता गया...!

इंन्सान भी बदलता गया...धीरे धीरे...!


एक बार...

गांव में सूखा पड गया...

बहुत ही बडा सूखा...

नदीयां , तालाब , कूंवे सूखे पडते गये...

हरा भरा गांव , धीरे धीरे कंगाल होता गया...


इंन्सानों के मन भी धीरे धीरे सुखे होते गये !

हर एक के मन से हरीभरी दूनिया उजड सी गई !

हर एक का मन भी सूखता गया !

उदास मन का समाज और समाधान शून्य समय के कारण ?

समाज के संस्कार भी गायब होते गये ??

धीरे धीरे...


आपसी प्रेम , भाईचारा खतम होता गया !


एक दूसरे को बडे प्रेम से और आनंद से, रामराम बोलना तो दूर की बात , एक दूसरे का मुंह देखने को भी कोई तैय्यार नहीं हो रहा था !


लडाई झगडा बढता गया !

स्नेह की जगह बैर ने ले ली !


धरती माता का प्यार भी सूख गया ! धरती माता उजाड और उदास हो गयी !

नदीयां कूंवे भी सूखते गये !


ऐसा क्यों हो गया ?

कैसे हो गया ?

ईश्वर का कोप हो गया शायद ?


सनातन धर्म एक आदर्श जीवन पध्दती थी उस गांव की !

इसका आचरण लोग बहुत ही आनंद से करते थे !


मगर...?

धीरे धीरे समय बदलता गया !

सनातन धर्म के प्रती स्नेह , प्रेम , आदर था...इसकी जगह नफरत में बदल गयी !


साधू संतों को ?

महापुरूषों को ?

देवीदेवताओं को ?

 *हमारे ही*  ??

लोगों द्वारा ?

बदनाम किया जाने लगा ? प्रताडीत , अपमानित किया जाने लगा !

 *हमारे ही लोग ?*

गौमाता का मांस भक्षण भी ? बडे ही आनंद से करने लगे ?


गांव में एक 

कूंवा था ,कभी भी ना सूखनेवाला !

ईश्वर की कृपा से उसमें सभी की प्यास बुझाने के लिये ?

बहुत जादा मात्रा में पाणी भी था !

मानो ? अमृत जैसा जल !


 *मगर...*??

इंन्सानों के मन बदल गये और ?

वह इकलौता कूंवा भी ?

सूख गया !


 *हाय राम...गजब हो* *गया...*


समाज में ? 

राम ही खलनायक लगने लगा ? 

 *और ??* 

रावण ? नायक ??

लगने लगा ?


बडे आनंद से फिल्मों में और प्रत्यक्ष भी नाचते हुए लोग...

 *भूत हूं मैं...भूत हूं मैं...* 

ऐसा आनंद से चिल्लाने लगे !


हराभरा संपन्न गांव आखिर ?

बरबाद हुवा ?

हर जगह जातीवाद का भयंकर जहर भर गया !

जातीवाचक गाली गलौच का भंडार ही खूल गया !


सबकुछ हाय तौबा ही हो गया !


यह सबकुछ आक्रीत विपरीत क्यों और कैसे हो गया ? किसी के समझ में भी नहीं आया !


*हरे रामा* 

अब तू ही मंदबुद्धी इंन्सानों को समझा देना !


👆🙏🙏🙏

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