मृत्युदंड

 *मृत्युदंड और सामाजिक* *शांती....!!*

✍️ २८२०


 *विनोदकुमार महाजन* 


🔺🔺🔺🔺


समाज में जब दुर्जनों की संख्या बढती है और सज्जनों की संख्या घटती है तब...

सामाजिक विद्रोह , अन्याय , अत्याचार बढने लगते है !

शासन व्यवस्था और कानून व्यवस्था ठप्प हो जाती है और समाज में अफरातफरी , हाहाकार मच जाता है !


ऐसे समय में सामाजिक न्याय एवं सामाजिक सौहार्द के लिये , दुष्ट शक्ती और दुर्जन व्यक्तियों को कठोर दंडीत करने से ही समाज व्यवस्था का संतुलन फिरसे कार्यान्वित हो जाता है !


मगर जब कानून व्यवस्था और शासन व्यवस्था ही ठप्प हो जाती है तो सामाजिक विद्रोह निर्माण करनेवाले असामाजिक तत्वों पर अंकुश कौन और कैसे लगाएगा ? यह महत्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित होता है !


दुष्ट दुर्जन शक्ती मतलब आसुरीक शक्तियों का समाज में जब हाहाकार फैलाने का काम बढता है और सज्जन शक्ती जब भयंकर मुसिबतों में फंस जाती है तब ? अदृश्य ईश्वरी शक्ती अथवा कुदरत का कानून इसमें हस्तक्षेप करता है और बिगडा हुवा सामाजिक संतुलन फिरसे स्थापीत करने की अदृश्य योजनाएं बनाता है ... तब...?

दुष्ट दुर्जन शक्तियों को कठोर दंडीत करने के लिये मृत्यू दंड का प्रावधान किया जाता है... सज्जन शक्ती जब त्राही माम् की स्थिती में होती है तब स्वयं ईश्वर भी चिंतीत हो जाता है...


 *और...?*

रामायण , महाभारत जैसी योजनाओं को कार्यान्वित करता है !


रावण , दुर्योधन , कंस , हिरण्यकश्यपू जैसे महाराक्षसी शक्तियों को आखिर ईश्वरी शक्तियों द्वारा संपूर्ण रूप से नेस्तनाबूत किया गया तभी जाकर सामाजिक समरसता तथा सामाजिक शांती प्रस्थापित हो गयी और सज्जन शक्तियों की हाहाकारी , विनाशकारी शक्तियों से संपूर्ण रक्षा की गयी !


इसिलिए ईश्वरी शक्तियों को हमेशा आसुरीक शक्तियों को मृत्यू दंड ही देना पडा था !


 *रक्तरंजित इतिहास के* *पन्ने भी इसके साक्षी* *है...!*


आखिर यह मृत्यू लोक तो है ही ! आनेवाला हर एक देहधारी सजीव एक दिन मृत्यू को प्राप्त करने वाला ही है...!

अगर हर एक की मृत्यू अटल है तो ईश्वरी अवतार लेकर किसी को कठोर मृत्यू दंड देने की आवश्यकता क्या है ?


जब अन्याय , अत्याचार , हाहाकार चरम सिमा पर होता है और इसके द्वारा सृष्टी संतुलन में बाधाएं उत्पन्न होती है तो... स्वयं ईश्वर को इस में हस्तक्षेप करना पडता है और आसुरी शक्तियों के अकाल मृत्यू की योजना बनानी पडती है !


क्योंकी मृत्यू दंड के सिवाय इनके लिए दूसरा कोई रास्ता ही नहीं बचता है !

क्योंकी आसुरीक शक्तियों से स्वयं ईश्वर भी परेशान रहता है...!


तो आखिर मन में यह प्रश्न भी उठता है की , आखिर ईश्वर ने आसुरीक वृत्ती और आसुरीक शक्तियों का निर्माण ही क्यों किया ?

ईश्वर सब सज्जन शक्ती ही निर्माण करता ना ?


उत्तर है...

सृष्टी से निर्मिती से लेकर सृष्टी के अंत तक ईश्वरी शक्ती और आसुरी शक्तियों का निर्माण भी और संघर्ष भी जारी रहेगा...!

क्योंकी सृष्टी निर्माण ही दो विरूद्ध शक्तीयों और विचारधारा पर आधारित है !

अमृत जहर

अच्छा बूरा 

देव दानव 

यह सिलसिला लगातार चलता ही रहेगा !

क्योंकी अगर दो विरूद्ध शक्तियां नहीं रहेगी तो यह अदृश्य ईश्वरीय खेल का कोई अर्थ ही नहीं रहेगा !


और आखिर मृत्यू दंड है क्या ? जन्म मृत्यू तो ईश्वरीय संरचना है...!

जब किसी को मृत्यू दंड दिया जाता है तो उस हाहाकारी पापात्मा को उसीके पंचमहाभूतों के देह से उसकी आत्मा सदा के लिये मुक्त की जाती है और उस आत्मा को अलग योनियों में भेज दिया जाता है अथवा रावण की तरह मोक्ष दिया जाता है...!

आखिर यह सब ईश्वरी खेल है...!

सृष्टी रचना का भी और सृष्टी संतुलन का भी...!


तो आज की भयावह स्थिती में भविष्य का ईश्वरी प्रायोजन क्या रहेगा ?


रावण, दुर्योधन,कंस हिरण्यकश्यपू जैसे अनेक हाहाकारी , उन्मादी , उन्मत्त , परपिडादायक पापात्माओं का संपूर्ण अंत और सृष्टी का नव सृजन अथवा पुनर्निर्माण ...जिसे धर्म पुनर्स्थापना भी कहते है...


और भविष्य में अनेक उन्मादी पापात्माओं का संहार होना तय तो है ही 

इसके सिवाय धर्म पुनर्स्थापना द्वारा सत्य युग का आरंभ भी तय है...!!


और इसके लिए अदृश्य ईश्वरीय शक्तियों द्वारा भविष्य कालीन समन्वयता का उद्धृत होना कोई भी नहीं टाल सकता है...!!


ईश्वरीय शक्तियों द्वारा सृष्टी के नवसृजन का समय भी नजदिक है...


 *जय श्रीकृष्ण...* 


🚩🚩🚩🚩

Comments

Popular posts from this blog

ऊँ कालभैरवाय नम :

संपूर्ण लेखांक भाग २५

सोनारीचा काळभैरवनाथ