हमें गरीब ही रहने दो

 *तो हमें गरीब ही रहने* *दिजिए...??*

✍️ २८१९


 *विनोदकुमार महाजन* 


💰💰💰💰


गरीबी एक सचमुच में शाप होता है !

एक असह्य , असहाय , मजबूर जीवन !

इसिलिए गरीबी हटाने के लिये पैसों की , रूपयों की ,डाॅलर की खनखनाहट जरूरी होती है...!


 *पैसा...पैसों से क्या नहीं* *मिलता है ??* 

सब कुछ मिलता है !

एक ऐशोआराम का जीवन !


इसिलिए हर एक को पैसा चाहिए !

धन वैभव चाहिए !

सब पैसों के पिछे भागते है !


पैसा काला हो , गोरा हो , बुरा हो , भला हो , संन्मार्ग का हो या फिर भ्रष्टाचार का...!

पैसा तो पैसा होता है !


मगर...रूकीए...

समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जो ? पैसों के पिछे नहीं भागता है...बल्की ... इमानदारी से और स्वाभिमान से अपना जीवन और जीवन चरितार्थ गुजरता रहता है !


 *मध्यमवर्गीय समाज..!* 


उसे पता है पैसों से सबकुछ मिलता है !

मगर फिर भी यह समाज गलत रास्तों से चलकर पैसा नहीं कमाता है और नाही पैसों की होड में लग जाता है अथवा नाही गलत रास्तों से पैसा कमाने के चक्कर में पडता है !


मध्यमवर्गीय लोगों का एक ही मकसद होता है... जीवनभर के लिये...

इमानदारी से नौकरी करों , इमानदारी से धंदा करो... मगर गलत रास्तों के धन के पिछे मत भागो...!

जो भी मिलेगा वह नेकी का मिलेगा और जो नशीब में है उतना ही मिलेगा...यही आजीवन धारणा होती है मध्यमवर्गीय समाज की !


झूठी माया , झूठे चक्कर , झूठे भुलभुलैया में यह समाज कभी भी यह समाज नहीं पडता है !


हर दिन की इमानदारी की छोटी कमाई भी ऐसे समाज को स्वर्गीय आनंद देती रहती है !


यह समाज सिध्दांतों से समझौता कभी भी नहीं करता है बल्की आजीवन सिध्दांतों पर ही चलता रहता है !


इसिलिए ऐसे समाज को गलत रास्तों की कमाई पसंत नहीं आती है बल्की इमानदारी की कमाई ही चाहिए होती है !

और ऐसा आदर्श समाज लगभग नब्बे प्रतिशत के आगे होता है !


इन्हे ना दारु बिअर की दुकाने खोलकर पैसा कमाने का शौक होता है ना ही मटका , गुटखा, सिगारेट की दुकान से पैसा कमाने की इच्छा होती है !

दूसरों का घर , जीवन बरबाद करने पर जो पैसा मिलेगा , ऐसा गलत रास्तों का पैसा इन्हें नहीं चाहिए होता है !


ऐसे लोगों की मन की हमेशा यही धारणा होती है की...

 *मैं गरीब रहूंगा तो भी* *चलेगा , मैं गरीब ही* *रहूंगा तो भी* *चलेगा...* 

 *मगर गलत रास्तों से* *चलकर पैसा नहीं* *कमाऊंगा !*


इसिलिए ऐसे व्यक्ती समाज में आदर्श होते है !

अधर्म का , भ्रष्टाचार का कितना भी भयंकर माहौल भी क्यों न हो...

 *पापभिरु व्यक्ती* 

कभी भी गलत रास्तों के धन को हाथ नहीं लगाते है !

ऐसे लोगों को दूसरों का धन भी नहीं चाहिए होता है !


 *आधी रोटी खायेंगे* 

 *मगर इमानदारी से* *जियेंगे* 


 *कभी कभी घर में भूखा* *भी रहेंगे मगर* *किसीसे उधार* *नहीं लेंगे* 

ऐसे आदर्श विचार धारा वाले लोग भी हमारे समाज में रहते है...


 *इसिलिए हमें गरीब ही* *रहने दो...*

ऐसी मानसिकता ऐसे लोगों की निरंतर रहती है !


मराठी संत तुकाराम महाराज कहते है...

" *ठेवीले अनंते तैसे ची* *रहावे...चित्ती असो* *द्यावे* *समाधान..."*


यही धारणा से चलने वाला हमारा समाज है...!


मगर राजा या राज्यकर्ता को ऐसी धारणा धारण करके नहीं चलना होता है... क्योंकी राज्य चलाने के लिये धन की तो सख्त जरूरत होती ही है...!

इसिलिए राज्यकर्ताओं को अनेक बार प्रजा की रक्षा तथा प्रजा के हीत के लिये सभी प्रकार के मार्गों का अवलंब करके धन जोडना पडता है !


समाज कार्य तथा समाज कल्याण के लिये भी धन की सख्त जरूरत तो होती ही है...!

इसिलिए राज्यकर्ताओं को हमेशा समाधानी नहीं बल्की असमाधानी रहकर ही समाज हीत के निर्णय लेने पडते है !


उच्च कोटी का बैराग्य धारण करेंगे तो वह व्यक्ती राज्य कैसे चलायेगा ?


इसिलिए साधारण व्यक्ती , सामान्य मनुष्य से अलग प्रकार का जीवन राज्य कर्ताओं का होता है !


आदर्श प्रजा निर्माण और आदर्श राज्य विस्तार के लिये राजा को या राजतंत्र चलाने वालों को हमेशा...

सत्य की रक्षा तथा जीत के लिये...

 *साम दाम दंड भेद* 

निती का पर्याय चौबीसों घंटे सामने रखकर ही न्यायसंगत तथा तर्कसंगत निर्णय लेने पडते है !


 *तभी आदर्श समाज का* *निर्माण संभव होता* *है..!*


 *जय श्रीकृष्ण* !!!


🙏🙏🙏🙏

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