पती पत्नी समन्वय
*पती पत्नी समन्वय कैसे* *रहेगा...?*
✍️२८२१
*विनोदकुमार महाजन*
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आज का गंभीर प्रश्न और गंभीर समस्या ?
क्या सचमुच में पती पत्नी समन्वय समाप्त होता जा रहा है ?
जी हाँ...
बिल्कुल सही बात है !
क्यों ?
क्योंकी दिन बदिन सुसंस्कृत समाज निर्माण के लिये आवश्यक होने वाला संस्कारों का धन धिरे धिरे विलुप्त होता जा रहा है !
एक जमाना भी था जब नर को नारायण तथा नारी को नारायणी का दर्जा दिया जाता था !
और लगभग हर घर में यही ईश्वरीय रिश्ता पती पत्नी द्वारा निभाया जाता था !
एक दूसरे के प्रती समर्पित भाव , उच्च कोटी का आपसी प्रेम , दोनों का सामंजस्य , श्रध्दा , विश्वास , प्रेम और एक दूसरे के लिये जान तक समर्पित करने का भाव...
यह पावित्र्य पती पत्नी रिश्तों को आजीवन एक धागे में बांधकर रखता था !
मगर इस संस्कृती संपन्न देश में धिरे धिरे जानबुझकर अविश्वास तथा हर एक की मनमानी, स्वैराचार का माहौल षड्यंत्रो द्वारा फैलाया गया...
परिणाम स्वरूप आज का विद्रोह तथा पती पत्नी कलह समाज में तेजिसे बढता गया !
यही कारण है की ,एक दूसरे के प्रती प्रेम की जगह नफरत बढती जा रही है !
दोनों में से एक संपूर्ण समर्पित प्रेम करता रहता है मगर दूसरे को इसके बारे में कुछ भी लेनादेना नहीं रहता है और अनायासे दोनों में धिरे धिरे कटुता बढती जाती है , एक दूसरे के प्रती दिवारे बढती जाती है और इसका एक दिन स्फोट होकर ही रहता है !
और दोनों के रास्ते जीवन भर के लिये अलग हो जाते है !
अथवा मजबूरन दोनों को एक जगह तो रहना ही पडता है मगर आपसी प्रेम और तालमेल संपूर्ण जीवन के लिये समाप्त हो जाता है !
और एक असह्य जीवन का आरंभ हो जाता है !
दूसरा एक महत्वपूर्ण कारण यह भी की , दोनों में से एक , ईश्वरीय सिध्दांतों पर चलकर , समर्पित भाव तथा समर्पित जीवन से चालता है तो दूसरा ? बिल्कुल इसके विपरीत मतलब ? आसुरीक सिध्दांतों पर चलकर , सामनेवाले आदर्श ईश्वरीय सिध्दांतों पर चलने वालों को , उसके आदर्श आचरण को तथा संपूर्ण समर्पित भाव को और उसके भावनाओं को केवल कुचलता ही नहीं है बल्की क्रूरता से अपने पैरों के निचे रौंदता रहता है !
आदर्श मन तथा आदर्श सिध्दांत गये भाड में , लगभग ऐसी ही धारणा आसुरीक सिध्दांतों पर चलनेवालों की होती है !
और इसी कारण से दोनों के बीच में एक अबोल नाता बढता रहता है !
और धीरे धीरे बढती दुरीयां एक अभेद्य दिवार बनकर रहती है !
रिश्ता तो है मगर उपरी दिखावे का !
मगर अंदर से दुखों का पहाड ?
तो ऐसा प्रेम या ऐसा नाता किस काम का ?
जहाँ आत्मीयता एक प्रतिशत भी नहीं है वह रिश्ता क्या सचमुच में रिश्ता होता है ?
इसी कारण आज समाज व्यवस्था छिन्नभिन्न होती जा रही है , समाप्त होती जा रही है !
रिश्तों में एक दूसरे के प्रती लगाव कम होता जा रहा है !
एक तर्फा प्रेम भी आखिर किस काम का ?
और अनायासे ही रिश्तेनातों में एक दूसरे से दूर रहने से ही समाधान प्राप्त होता जा रहा है !
आखिर रिश्तेनातों में इतनी भयंकर कटूता क्यों आती जा रही है ?
नर का नारायण और नारी की नारायणी बनना तो दूर की बात है...आपसी स्नेह भी समाप्त हो जाता है !
और जिस रिश्तों में आपसी स्नेह , आत्मियता , प्रेम नहीं है वह रिश्ता भी किस काम का ?
विशेषतः हिंदू परिवारों में यह ग्रहण बहुत तेजी से फैलता जा रहा है !
परिणाम ?
घटस्फोट तक रिश्ते आ रहे है !
समझौता नाम की चीज भी बची है या नहीं ऐसी आशंका मन में आ रही है !
और जो मन का बडप्पन दिखाकर समझौता करने को तैय्यार है , उसके मन भावनाओं को भी रगडा जा रहा है , कुचला जा रहा है !
सांस्कृतिक अध:पतन के कारण एक आदर्श जीवन प्रणाली तथा आदर्श रिश्ते नातों में मिठास की बजाए खटास बढती जा रही है !
और खटास की जगह अब कडवाहट में बदलती जा रही है !
सामाजिक समतोल बनाने के लिये तथा रिश्तेनातों की दूरीयां कम करने के लिये अब फिरसे हमारे समाज को आदर्श संस्कृती की ओर बढना होगा !
इसके सिवाय कोई चारा ही नहीं बचा है !
*जय सिताराम*!!
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