घर की अशांति

 *घरेलु विवाद और मन* *की अशांती...??*

✍️ २७९८


 *विनोदकुमार महाजन* 

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लगभग हर घर में आज के भयंकर भागदौड के समय में प्रसन्नता गायब होती जा रही है और मन की बेचैनी अशांतता दिन बदिन बढती जा रही है !

आईये आज इसकी कारण मिमांसा करते है !


क्या आज लगभग ऐसा ही होता जा रहा है ?

घरेलु विवाद आज अनेक नयी समस्याएं उत्पन्न करता जा रहा है !


क्या हो गया है मनुष्य प्राणी को ?

हर घर में सामंजस्य खतम होता जा रहा है , और विनाशकारी अहंकार हर जगह पर निर्माण होता जा रहा है !

इसिलिए रिश्तेनातों में भी दूरीयां बनती दिखाई दे रही है !

एक दूसरे के प्रती उच्च कोटी का प्रेम , स्नेह , समर्पण भाव , आत्मियता समाप्त होती जा रही है !

इसकी जगह क्रोध, अहंकार बढता जा रहा है !

रिश्तों की मिठास खतम होती जा रही है और खटास बढती जा रही है !

एक दूसरे के प्रती प्रेम की जगह भयंकर कडवाहट बढती जा रही है !

सच्चे मन से प्रेम करनेवालों की कीमत नगन्य ही नहीं बल्की शून्य होती जा रही है !


इसी कारण रिश्तेनातों में दूरीयां भी बढती जा रही है ! कोई किसीके मन का विचार करने को ही तैय्यार नहीं है !


विभक्त कुटुंब व्यवस्था के कारण हर दिन अनेक नई समस्याएं उत्पन्न होती जा रही है !


मन का बोझ हलका करने के लिये भी आज जगह नहीं मिल रही है ?

इसिलिए एकाकीपण , अकेलापण बढता जा रहा है ! और अनायासे ही मन की अशांती भी बढती जा रही है !

अंदर ही अंदर मन उबगता सा जा रहा है !


इसिलिए सामुहिक तिर्थाटन वगैरे लगभग समाप्त सा होता जा रहा है और अकेले रहने में ही मन की स्थिती बनती जा रही है !


हर एक को पैसा चाहिए ! शान शौकत के लिये पैसा ! ऐशो आराम के लिये पैसा !


और पैसा नहीं मिला तो ? रिश्ता ही खतम ?

यह कैसी दुनियादारी आगे बढ रही है ?

आत्मचिंतन की जगह आत्मक्षोभ बढता जा रहा है !

हर एक के अंदर की बेचैनी अस्वस्थता विश्वास समाप्त होता जा रहा है !

केवल पैसों का ही रिश्ता और पैसों से ही रिश्ता ऐसी विनाशकारी मानसिकता समाज मन में तेजी से बढ रही है !


और इसका अंतिम हल कोई दिखाई नहीं दे रहा है !

उपरी दिखावा , भपका , भूलभैलैया , वरपांगी प्रेम और प्रेम की नौटंकी दिनबदिन तेजीसे बढती जा रही है !

पैसों से मिलने वाले सभी सुख चाहिए ही !

ऐसे झूटे सुखों के कारण , भूलभैलैया के कारण , एक दूसरे के प्रती प्रेम , स्नेह से किसी को कुछ भी लेना देना नहीं रहा है !

अपनी मस्ती में पैसेवाला मस्त है !

सच्चे दिलवाला अंदर ही अंदर रो रो के त्रस्त है !


हर जगह मनभेद , मतभेद दिखाई दे रहे है ! उपरी दिखावे के लिये ही केवल एकमत दिखाई दे रहा है !


जनसंख्या विस्फोट हो गया मगर काम के लिये कोई इमानदार व्यक्ती मिलना भी लगभग असंभव सा होता जा रहा है !

पैसों की भूक बढती जा रही है और पैसों से मिलने वाले सभी सुख साधन की अपेक्षाएं भी आसमान छू रही है !


गाडी चाहिए , बंगला चाहिए, करोडो का बैंक बैलन्स भी चाहिए !

मगर फिर भी मन अंदर से अशांत है !

अमीरी का दिखावा तेज है !


अमीरों को रामराम 

गरीब तेरा क्या काम ?

लगभग ऐसी ही सामाजिक सामुहिक धारणा बनती जा रही है !

चाहे कितना भी पैसा मिले मन की अशांती बढती जा रही है !


सत्य और सत्य स्थिती पर कोई विचार करने को और उसपर आशावादी रास्ता निकालने के लिये ही कोई तैय्यार नहीं है !


एक दूसरे का मन समझने के लिये , एक दूसरे को उच्च कोटी का मानसिक आधार देने के लिये भी कोई तैय्यार नहीं है ?

आश्चर्य है ना सबकुछ ?


यही कलीयुग की चरमसीमा है और ?

इसका अंत भी लगभग तय है !!


शायद ईश्वर ही ऐसी भयावह और विनाशकारी , उन्मादी समाज रचना के विरूद्ध कोई यशस्वी रणनीती , योजनाएं बना रहा होगा ?


श्रीकृष्णार्पणमस्तु


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