दुर्जनों से छूटकारा

 *दुर्जनं प्रथमं वंन्दे...*

✍️ २८०३


 *विनोदकुमार महाजन* 


🙏🙏🙏🙏


नफरत करनेवालों के सिने में प्यार भर दूं...

मैं वो परवाना हूं

पत्थर को मोम कर दूं...


यह एक पुराना किशोर कुमार का गाना है...जो अमिताभ बच्चन पर शूट किया हुवा है...!

मतलब ?

नफरत करनेवालों के भी सिने में प्यार भरनेवाला...?

क्या यह संभव है या होगा ...?


और एक संस्कृत वाक्य भी है...

दुर्जनं प्रथमं वंन्दे...!


उपर के दो विरूद्ध विचार एक करके उसपर आज के लेख में विवेचन करते है !


 *भगवान श्रीकृष्ण...* 

विष्णू का आठवा अवतार 

प्रेम को सर्वोच्च स्थान देनेवाला महान देवता 

योगेश्वर...

योगीयों का योगी

सभी कलाओं में पारंगत 

कुटिल राजनितीज्ञ...

फिर भी जन्म से लेकर अवतार समाप्ती तक कठोर संघर्ष...

भयंकर दुखदर्द झेलकर भी... स्थितप्रज्ञ...

सुदर्शन चक्र धारी...

अजेय...

देहरुप धारण करके जब धरती पर अवतारी हुवा...

तब...?

क्या हुवा...?

दुर्योधन ? दुष्ट षड्यंत्रकारी दुर्योधन ??

हाहाकार मचाने वाला दुर्योधन...?

सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण को भी ललकारता था...

क्यों...???

क्योंकी दुष्ट था...


फिर भी श्रीकृष्ण ने 

कृष्ण शिष्टाई की...

युद्ध को चौतरफा रोकने की कोशिश की...

दुष्ट षड्यंत्रकारी दुर्योधन माना ? सुधरा ??

नहीं...

श्रीकृष्ण को भी हताश किया...?

दुर्योधन ने...


दुर्जनं प्रथमं वंन्दे का मतितार्थ फिर क्या है...?


उपरी फिल्मी गाणे में 

बच्चन कहते है...

नफरत करनेवालों के सिने में प्यार भर दूं...

क्या आपको संभव लगता है ?

नफरत करनेवाला मतलब ? दुर्जन...

क्या दुर्जन का भी ह्रदय परिवर्तन हो सकता है ?

उसके ह्रदय में भी प्रेमभाव उत्पन्न हो सकता है ?


हरगीज नहीं...

अगर ऐसा होता तो...

भगवान श्रीकृष्ण को धर्म युद्ध नहीं करना पडता...


हमारे आसपास भी पग पग पर अनेक दुष्ट दुरात्माएं , गुप्त या सुप्त रूप से हमेशा मंडराते रहते है ?

जरूरत है उन्हे तुरंत पहचानने की और ?

उनसे सदा के लिये दुरीयां बनाये रखने की..


इसिलिए दुर्जनं प्रथमं वंन्दे 

🙏

अन्यथा...ऐसे दुष्ट दुर्जन हमारा संपूर्ण जीवन ही तबाह कर सकते है...

बरबाद कर सकते है...


इसिलिए सज्जनों की और दुर्जनों की कभी पटती नहीं है...जमती नहीं है...

सज्जन हमेशा सभी के हितचिंतक होते है और दुर्जन हमेशा जहरीले सांप की तरह डसने वाले होते है...


इसिलिए संतसंग अथवा सज्जनों की संगत हमेशा हितकारक होती है और दुर्जनों की संगत 

हानिकारक...!


मगर कभी कभी ऐसा भी होता है की 

दुर्जन सदैव हमारे कुंडलीनी में ही बैठते है...

चौबिसों घंटे उनके साथ ( मजबुरन ) रहना भी पडता है...तब...?

हमारा दम घुटता रहता है... इच्छा तो उससे सदा के लिये दूर चले जाने की...

मगर परिस्थिती ही मजबूर कर देती है...

और जब ऐसा प्रसंग हमारे जीवन में आता है तो ? दुर्जनं प्रथमं वंन्दे का...अर्थ भी शून्य हो जाता है...


और शुरू होता है 

सज्जन शक्ती और दुर्जन शक्ती का कठोर संघर्ष...

लगभग आजीवन...


और इससे छुटकारा ?

ना के बराबर...

कितने भी दैवी उपाय करो... तिर्थाटन करो...व्रत वैकल्य करो..

सांप के मुंह से थोडे ही अमृत निकलेगा ? वह तो चौबिसो घंटे जहर ही उगलेगा ?

है ना ?

और यह जहर बारबार हजम करना लगभग असंभव सा होगा 

और जीवन में नैराश्य बढता जायेगा 

मन को कितनी भी तसल्ली दी , मन आनंदी करने का कितना भी प्रयास करें ?

सब निष्फळ ही होगा...


तब किसी अच्छे , सच्चे , नेकदिल व्यक्ती का सहयोग और सहवास आनंदीत करेगा...


मगर सच्चे , सह्रदयी व्यक्ती आज के स्वार्थ के बाजार में मिलेंगे कहां ?

कथा किर्तन संतसंग तो कुछ समय के लिये ठीक है... मगर आजीवन आनंदीत करने के लिये , सारे दुख दर्द भगाने के लिये , ऐसा श्रेष्ठ पुरूष , स्त्री , शुध्द आत्मा मिलेंगे कहां ? वह भी ऐसे भयावह और घोर कलियुग में ?

लगभग असंभव...!


सभी के जीवन में लगभग ऐसे प्रसंग तो आते ही है...बारबार...


फिर शुरू होता है 

सुयोग्य गुरू का और ईश्वर का शोध...

मगर जबतक कर्म गती के फेरों से छुटकारा नहीं मिलता है तबतक सच्चे गुरू भी नहीं मिलते है...


और जब सच्चे गुरू मिल जाते है तभी से ?

हमारा नया जीवन आरंभ हो जाता है...


और फिर 

 *आनंदाचे डोही* 

 *आनंद तरंग की* 

 *दिव्य अनुभूती* मिलने लगती है...


 *जीस दिन* 

सच्चा शुभचिंतक मिलेगा वह हमारे जीवन का परमोच्च आनंद का क्षण होगा...

चाहे वह गुरू हो , ईश्वर हो , सच्चा दोस्त हो या फिर और कोई सच्चा साथी...

जीवनभर के लिये सुखदुःख आनंद से बांटनेवाला...


इसिलिए दुर्जनों के संगत से सदा के लिये छुटकारा हमारे जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण होता है...


 *दुर्जनं प्रथमं वंन्दे* 


🙏🙏🙏🌹

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