वायनाड

 वायनाड...!

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मेरे एक मित्र तथा मानवता आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री.मुकेश शर्माजी ने मुझे वायनाड पर एक अच्छा लेख लिखने को कहा।मेरा यह परम सौभाग्य है ऐसा मैं मानता हुं।
वास्तव में अमेठी और वायनाड में विचित्र ध्रुवीकरण देखने को मिलता है।गले में जनेऊ, रूद्राक्ष माला,ललाट पर तिलक लगानेपर भी,और मंदिर मंदिर घुमने पर भी काँग्रेस का पारंपरिक मतदार संघ,अमेठी में राहुल गांधी हार गए।
मतलब साफ है।मतदाता अब जाग चुका है।और असलियत जान रहा है।अगर मतदाता को कोई स्वाँग रचाकर फँसाने की कोशिश करता है तो,मतदाता तुरंत असलियत पहचान जाता है।और जागरूक लोकतंत्र में ऐसा होना भी आवश्यक भी है।
अब वायनाड पर चलते है।
राहुल गांधी जी ने मंदिर मंदिर घुमने पर भी वहाँ के विशिष्ट समाज ने राहुल गांधी को नकारा नही तो अपनाया भी,और भारी बहुमतों से जीत भी करवाई।
प्रधानमंत्री श्री.नरेन्द्र मोदिजी ने केरल के लिए क्या नही किया ?
बाढपिडितों को राहत देने से वहाँ का समाज राष्ट्रप्रेम में जुडने के लिए, तथा मुख्य राष्ट्रीय प्रवाह में आकर विकसित होने के लिए, अनेक योजनाएं कार्यान्वित की।
क्या फायदा हुवा?राष्ट्रीय प्रवाह में आना दूर, मोदिजी को भी नकारा गया।
क्यों...?
आखिर यह मानसिकता क्या दर्शाती है ?
तो आखिर यह सवाल उठता है की,हम किसिको भाई समझकर उसको कितना भी प्रेम, मान,संन्मान क्यों न दे,वह समय आनेपर हमारे प्रेम को,ईशत्व को पैरों तले कुचल ही देता है।यही वास्तव है।और यही केरल में भी हुवा है।
इसिलए किसिको अगर हम सहिष्णु बनकर कितना भी फायदा करने की कोशिश करें,अथवा मानवता, भूतदया,ईश्वरी सिध्दांत सिखाने की कोशिश करे,कितनी भी योजनाएं दे,
हमारे साथ अमानवीयता,धोकाधड़ी ही होगी।
जब तक कोई असुरी सिध्दांतों को छोडकर ईश्वरी सिध्दांतों का स्विकार अगर कोई नही करता है तो उसे मनवता की,भाईचारे की,दिव्य प्रेम की,सहयोग की अपेक्षा करना गलत ही होगा।मैं ऐसे समाज को दोषी नही ठहराता हुं,बल्कि उनकी गलत विचार धारा का विरोध करता हुं।
वायनाड तो एक उदाहरण है।संपूर्ण देश में और संपूर्ण विश्व में भी ऐसी ही विचारधारा देखने को मिलती है।
और यही वजह है की,संपूर्ण विश्व में तेजी से ध्रुवीकरण हो रहा है।
सत् और असत् का यह कडा संघर्ष भविष्य में अतीभयंकर तथा उग्र रूप धारण भी कर सकता है।
इसिलिए दो विरुद्ध शक्तियाँ संपूर्ण विश्व को तीसरे जागतीक महायुद्ध की तरफ ले जा रही है।
इसकी केवल और केवल एक ही वजह है....
कृतघ्नता.....।
हरी ओम।
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विनोदकुमार महाजन।

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